संरचना व इतिहास

गर्भगृह में स्थापित प्राचीन प्रतिमा श्री वाराह अवतार

तिरुपति, बद्रीनाथ तथा भरत मन्दिर में स्थापित हृषीकेश नारायण की प्रतिमा एक ही शालिग्राम शिलासे निर्मित है। बद्रीनाथ में नारायण अकेले ही निवास करते हैं और यहां भी नारायण की एकाकी काली शालिग्राम शिला से निर्मित चतुर्भुजी प्रतिमा स्थापित है। विशाल प्रस्तर खंडों द्वारा 7-8 फीट चैड़ी दीवार से मन्दिर निर्मित है। गर्भगृह में एक ही शालिग्राम शिला से निर्मित 5 फीट से भी ऊंची हृषीकेश नारायण की काली चतुर्भुजी प्रतिमा स्थापित है। समीप ही एक प्रस्तर खंड पर वराह भगवान की प्रतिमा है।

मन्दिर के बाह्य प्रकोष्ठ का पुनर्निर्माण सम्वत् 1889 (1832 ई0) में नाभा स्टेट के महाराजा यशवंत सिंह साहिब मालवेन्द्र बहादुर ने किया। मंदिर शिखर के गुम्बद का निर्माण एक ही विशाल शिला से किया गया है, जिसका वजन 125 टन आंका गया है। मुख्य मंदिर के निर्माण में सोलह कोण बनाये गये हैं। मंदिर के बाह्य प्रकोष्ठ के ऊपर नौ गुम्बद हैं, जो तीन-तीन की पंक्ति में बने हैं। मंदिर की परम्परा के अनुरुप आन्तरिक गर्भगृह में जहां हृषीकेश नारायण (श्री भरत भगवान) की मूर्ति एवं श्री यन्त्र प्रतिस्थापित हैं,

वहां स्नानादि एवं अंगन्यास आदि कर पवित्र हो परम विशिष्ट वीतरागी भक्तों एवं सुधीजनों को ही प्रविष्ट होने दिया जाता है। मंदिर के परिक्रमा मार्ग में नारायण प्रतिमा के पृष्ठभाग में एक शिला पर पाली-प्राकृत भाषा में अंकित अभिलेख से विदित होता है कि किसी क्षत्रिय राजा ने 12वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में भी मन्दिर का जीर्णोद्धार किया था। पुरातत्ववेत्ताओं का कथन है कि मूल मन्दिर आद्य शंकराचार्य से भी बहुत पूर्व का है। मन्दिर के निर्माण में प्रयुक्त पाषाण खंडों को देखने से भी इस बात की पुष्टि होती है कईं सौ वर्षों से आंधी व तूफानों को सहते-सहते वे कितने जर्जर हो गए हैं। मन्दिर की विशिष्ट निर्माण शैली से यही प्रतीत होता है कि वर्षों पूर्व गंगा का प्रवाह समीप ही रहा होगा, जिससे सुरक्षा के कारण मन्दिर ऊँचे परकोटे पर स्थापित किया गया है।

मन्दिर के समीप ही गढ़वाल विश्वविद्यालय के पुरातत्व विभाग द्वारा उत्खनन से प्राप्त ईंटों व मिट्टी के बर्तनों से उक्त तथ्यों की पुष्टि होती है। प्रवेशद्वार के सम्मुख स्थित वट वृक्ष भी अत्यन्त प्राचीन है। मन्दिर के परिक्रमा मार्ग में पाली-प्राकृत शिलालेख के ऊपर बूटधारी सूर्य की प्रतिमा का प्रचलन शक् युग में विद्यमान रहा। ऐतिहासिक ग्रंथों से विदित होता है कि अंतिम शक् शासक रुद्रदेव को चंद्रगुप्त द्वितीय ने तीसरी शताब्दी में पराजित किया। पाषाण खंड पर उत्कीर्ण बूटधारी सूर्य की प्रतिमा से ज्ञात होता है कि मन्दिर ईसा की प्रथम-द्वितीय शताब्दी से भी पूर्व का है।

श्री यन्त्र

गर्भगृह में हृषीकेश नारायण की प्रतिमा के ऊपर मन्दिर के गुम्बद के आन्तरिक भाग में अधोमुख आमलक पर शिलााखण्ड से निर्मित श्री यन्त्र प्रतिस्थापित है।

ऐसा अनुमान है कि जगद्गुरु आद्यशंकराचार्य ने नवीं शती के प्रथम दशक में मन्दिर जीर्णोद्धार के समय शैव, शाक्त, वैष्णव, गाणपत्य और सौर इन पाँच वैदिक उपासना पद्धतियों में सुन्दर समन्वय स्थापित करते हुए परम विशिष्ट तथा गोपनीय प्रणाली से साधना किये जाने वाले इस यन्त्र की प्राण-प्रतिष्ठा कतिपय चुनित साधकों के आध्यात्मिक उत्थान हेतु की थी, यह (श्री यन्त्र) शैव तथा वैष्णव सम्प्रदाय की विविध शाखा-प्रशाखाओं द्वारा अनुमोदित एवं मान्य है।

श्री यन्त्र के सन्निवेश से हृषीकेश के इस प्राचीन मन्दिर की महानता एवं आध्यात्मिक गूढ़ता में और भी वृद्धि होती है।